बात 1974 की है. एक बिजनस मैन रूसी करंजिया ने अपनी फिल्मी पत्रिका शुरू करने के बारे में सोचा,
मेगज़ीन का नाम रखा गया ‘सिने ब्लिट्ज’. वो मेग्ज़ीन को अपने पहले अंक से ही सनसनीखेज बनाना चाहते थे,
जिससे वो जल्दी ही मार्केट में छा जाये. उन्होनें अपनी बेटी रीता करंजिया से इस बारे में डिस्कशन की।
आखिर वो दोनों इस नतीजे पर पहुँचे कि, पहले ही अंक
को चर्चित करने के लिये हम कवर पेज पर किसी मॉडल
या एक्ट्रेस की न्यूड तस्वीर छापेंगे, वो लड़की कौन होगी
और उसे इस काम के लिये कैसे तैय्यार किया जायेगा,
इसकी जिम्मेदारी रीता ने ली.

70 के दशक में किसी लड़की को वो भी भारत में ..
इस काम के लिये तैय्यार करना बहुत टेढ़ा काम था.
कई एक्ट्रेस और दूसरी लड़कियों से रिजेक्शन मिलने के
बाद रीता की नज़र गई एक मॉडल .. प्रोतीमा बेदी पर .
प्रोतीमा की इमेज तब एक लिबरल और आज़ाद ख्याल
लड़की की थी. रीता ने उससे मुलाकात कर उसके सामने
ऑफर रखा कि अगर वो औरतों की आजादी का मेसेज
देने के लिये अपने सारे कपड़े उतार कर मुम्बई की सड़क
पर दौड़ लगाये,…. तो हम वो फोटो शूट करेंगे
और अखबार में इन फोटोज को नारी स्वतंत्रता के नाम पर छापेंगे .. क्या तुम में है इतनी हिम्मत?
प्रोतीमा बेदी ‘विमन लिबरेशन’ के नाम पर तैय्यार हो गई.
एक अल सुबह मुम्बई के फ्लोरा फाउंटेन की सड़क पर
उसने न्यूड होकर दौड़ लगायी…और उसका फोटो शूट
किया गया…. प्रोतीमा ने जब वो फोटो देखे तो उसे वो
ठीक नही लगे. उसने दोबारा शूट करने को बोला.


दो दिन बाद तड़के उसने फिर न्यूड होकर जुहू बिच पर
दौड़ लगायी. इस बार वो फोटो शूट से संतुष्ट थी.

बाद में जब उसे पता चला कि “विमन लिबरेशन” के
नाम पर मुझे बेवकूफ बनाकर….ये फोटो किसी नयी
फिल्मी मेगज़ीन के कवर पर छपने वाले है,
तो वो बड़ी नाराज हुई.
उसने यहाँ तक बोला कि,..ये फोटो तो मेरे गोआ ट्रिप के है, जिसे मेगज़ीन ने बैकग्राउंड चेंज कर के छाप दिया है,
लेकिन जिस काम के वो पैसे ले चुकी थी..
उसे छपने से रुकवा नही पायी. सिने ब्लिट्ज को रातोंरात पब्लिसिटी मिली और मेगज़ीन हिट हो गई.

बात 2011 की है. काँग्रेस के बेशुमार घोटालो की
वजह से भाजपा को अगले चुनाव में दिख रही सम्भावित
बढ़त को देखकर .. NGO और मिशनरी गैंग सक्रिय हुआ.


रातों-रात अपने ही एक विश्वस्त आदमी कंजरीवाल को ईमानदारी के नाम पर आंदोलन करने के लिये तैय्यार किया गया.. जिसे काँग्रेस का भी समर्थन प्राप्त था.
लेकिन दिक्कत वही थी कि, ईमानदारी का मॉडल किसे बनाये? तब काँग्रेस समर्थक गन्ना हजारे को तैय्यार किया गया.. भ्रष्टाचार से लड़ाई के नाम पर.

प्रोतिमा बेदी जुहू बिच पर दौड़ी थी.. इनको जंतर मंतर
पर बैठाया गया….. ठगी वो भी गई थी.. ठगे ये भी गये.
मेगज़ीन भी हिट हो गई..
आंदोलन के नाम पर नेतागिरी भी हिट हो गई. पछतावा प्रोतिमा बेदी को भी हुआ था.. गन्ना हजारे को भी हुआ.

ना विमन लिबरेशन हुआ…और ना ही जनलोकपाल आया…

एक अंतर था कि रूसी करंजिया ने अकेली प्रोतिमा बेदी को बेवकूफ बनाया और कंजरवाल ने देश के करोड़ो लोगों को.

लेकिन हकीकत यही है कि,…लॉन्चिंग का, लोगों को बेवकूफ बनाने का….ये तरीका बरसो पुराना है.

गुजरात के ऊना में दलितों की कथित पिटाई और उसका विडिओ देशभर में वायरल होना भी लॉन्चिंग पेड ही था..
जीग्नेश मेवाणि का.
इस बार पहले गुजरात में मॉडल को पिटवाया गया, फिर महाराष्ट्र में कत्ल करवाया गया..
अभी और भी नये नये ड्रामे होना बाकि है..

इस बार दलितों के नाम पर भाजपा को रोकना है.. आश्चर्य मत करना अगर कुछ नेता भी नंगे होकर दौड़ने लगे तो.. आखिर उनकी आखरी उम्मीद इसी पर टिकी है. साभार : Ashish Retarekar

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