लइकाइं में हमनी के बाबा बड़ा कुल्ही खीसा कहानी सुनावत रहनी ओहि में से ईगो इयाद आइल ह त सोचनी ह की रउआ लोग संगे एकरे के शेयर क दीं …

कौनो गावं में एगो बूढ़ मेहरारू अपना तीन गो लइकी सोन के संगे रहत रहे. ओकर तीनो बेटी रूप आ रहन में काढ़ के रहलीसन, बाकिर एगो दिक्कत रहे की सभनि के तोतरा के बोलत रहली सन. बुढ़िया बड़ा परेसान रहे की ओकनी के बियाह हो जाइत। लोग आवे आ देखला के बाद पसन कर लेव लेकिन जैसेही बोल सन की बियाह टूट जाव. तब बुढ़िया उपाय सोचलस आ जब अगिला हाली लइका वाला आइल लोग त बुढ़िया सब लइकियन के मन कर देहलस की कौनो बोलीह सन जन। फेर त लइका वाला आइल लोग आ लइकियन के देख सुन के पसन कर लिहल लोग. बाकिर देखनहरुअन में ईगो कान रहे. देहात में लोग कहेला की कान बड़ा तेज होखे ल सन.. त उ कनवा कहलस की कौनो बात जरूर बा। आखिर का बात बी की कउनौ लइकिया बोलत नइखी सन. खैर खाना परोसा गइल आ सब लोग खाए लगल।

तब कनवा कहलस की सब खाना त ठीक बा बाकिर कढ़ी में नून तनी काम बा. खानवा बड़की बनवले रहे… ओकरा से न रहाईल त ऊ कह तिया “दाल बनवनी, भात बनवनी तल्हि ताहे फ़िका, ई सुन के मंझली कह तिया ले दिदिया माई तहुवे तूप ताप लहे के, तबले छोटकी अपना मुह पर हाँथ रख के कह तिया ए भाई हम तूप ताप. आ अइसे सभनि के भेद खुल गइल. तब से लोग कहेला की “अइँछ, कान, कोत गरदनिया— एह तीनो से कांपे दुनिया.

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