औसतन हर 6 किमी पर सूखती नजर आई गंगा…तभी कोई सहायक नदी आकर मिली और फिर बहने लगी गंगा।

गंगा जहां बिहार में प्रवेश करती है वह बक्सर जिले का चौसा है, उस पार यूपी का गाजीपुर जिला। यहीं कैमूर पर्वतमाला के सारोदाग से निकलने वाली कर्मनाशा गंगा में समाती है। कर्मनाशा रोहतास व कैमूर की दुर्गावती, धर्मावती व कुदरा जैसी बरसाती नदियों का पानी गंगा में उड़ेलती है। यहीं से दैनिक भास्कर टीम की मोटरबोट गंगा में उतरी।… नदी में प्रवाह नहीं के बराबर। मुहाने पर गाद। गंगा यहां बमुश्किल 500 मीटर में है।
इसी घाट पर स्नान करते थे राम-लक्ष्मण
कर्मनाशा-गंगा संगम बक्सर से करीब 14 किमी पश्चिम है। बक्सर के रामरेखा घाट को शाहाबाद का लोक सर्वाधिक पवित्र स्थान मानता है। यहां लोक मान्यता है कि राम-लक्ष्मण इसी घाट पर स्नान करते थे। रामरेखा घाट के सटे पूरब ताड़का नाला गंगा में गंदा पानी भरता है। आगे वीर कुंवर सिंह सेतु। पुल बक्सर को बलिया से जोड़ता है। पुल के आगे गंगा सुस्त चाल से आगे बढ़ती है। कहीं-कहीं धारा मुश्किल से 100-150 मीटर चौड़ी है।
पुल के पश्चिम बयासी को बलिया से जोड़नेवाला पीपा पुल है। पीपा पुल और निर्माणाधीन पुल के बीच तापी और राजगुरू ड्रेजर ड्रेजिंग कर रहे हैं। काम समाप्त हो चुका है। नदी में 30-35 किमी की दूरी तय करने के बाद सती घाट है। सरयू का पानी गंगा में प्रवाह रचता है। नदी की यह चाल मुश्किल से छह सात-किमी तक कायम रहती है। फिर मंथर पड़ जाती है। अब गंगा भोजपुर और छपरा के बीच बह रही है। कई धाराओं में विभक्त होकर।

दियारे में दिखे बंदूकधारी

दियारे में बंदूकधारी लोगों का समूह दिखा। यह आरा का इलाका है। रामपुर-बिंदगांवा मौजा के पास बलवन टोला में सोन-गंगा का संगम है। संगम के नोज पर थोड़ी सी जमीन पटना जिले की है लेकिन खेती दूसरे जिले के लोग करते हैं। सोन-गंगा का पुराना संगम दीघा में था। सोन में उतना ही पानी है जितना मुहाने को जिंदा रखने के लिए जरूरी होता है। मनेर के हरदी छपरा से पूर्व बढ़ने पर ईंट भट्‌ठे की चिमनियां कतार से दिखती हैं। यह शाहपुर का इलाका है। यहां से डाउन स्ट्रीम में नदी दानापुर और दीघा के जयप्रकाश सेतु के पास से उत्तर की ओर धुमाव लेती हुई पटना शहर से काफी दूर जा चुकी है। उतनी दूर कि नदी की पेटी से शहर नहीं दिखता।

बाढ़ के आगे बढ़ते ही गंगा उत्तर की ओर मुड़ती है। मुख्य धारा से छिटकी एक पतली धार यहां मलई दीयर का निर्माण करती है। दरियापुर से आगे गंगा से एक छोटी धार फूटती है, जिसे मर-गंगा (मरंगा) कहते हैं। हरोहर का पानी मर-गंगा की धार में पानी भरता है। सूर्यगढ़ा में नदी फिर दो भागों में बंटती है और एक लंबे टापू का निर्माण करती है जो मुंगेर तक फैला है। मुंगेर के आगे गोगरी होते हुए बहती है जहां इसे बरहखाल के नाम से जाना जाता है। यहां से मधुरापुर होते हुए, बिहपुर तक पहुंचती है। बिहपुर से यह दक्षिण की ओर साहेबगंज तक पहुंचती है, जहां लोग गंगा की एक धार को कलबलिया धार कहते हैं, जिसमें बरसात के मौसम में ही पानी आता है। गंगा की एक धारा का नाम गंगा चरण भी है।

अजगैबीनाथ मंदिर के उत्तर गंगा की एक धार फूटती है जिसे लोग यमुनिया या जओनिया कहते हैं। यहां से पथरघाट तक नदी पथरीले इलाकों से होकर गुजरती है। इसके उत्तर कलबलिया के मुहाने पर सहली है। कुरसेला में कोसी की विशाल धारा मिलती है। यहां एक धार को गंगा प्रसाद भी कहते हैं। कुरसेला के कोसी-गंगा संगम के बाद नदी कटिहार, पश्चिम बंगाल के मालदा, झारखंड के साहेबगंज का सिमाना रचती हुई फरक्का पहुंचती है। गंगा में बूढ़ी गंडक, कोसी पानी भरती हैं। बाढ़ के लिए बदनाम इन नदियों के सहारे ही गंगा में धार है। इन्हें कोसिए मत!


पटना के गांधीघाट और गायघाट के बीच व गांधीसेतु के पश्चिम संगम की अनोखी तस्वीर। भारत के नक्शे सी उभरती आकृति। हरे रंग के पानी वाली गंगा और मटमैली गंडक के संगम के बीच में टापू-सा दिखाई देने वाला हिस्सा सारण के सबलपुर दियारे का है।

( साभार – दैनिक भास्कर )

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