यकीन नहीं तो आज की दो खबरों के नज़रिए से पहले अखबारों को देखिए। पहली ख़बर – सीएम के काफ़िले पर हमले से बड़ी कोई ख़बर नहीं थी लेकिन हिंदी समाचार पत्रों में दैनिक जागरण और राष्ट्रीय सहारा को छोड़कर सभी अन्य ने इस ख़बर को ज़हर समझा। हिन्दुस्तान में ये ख़बर फ्रंट पेज पर छिपाकर छोटे से हिस्से में लगाई गई और वो भी इस अपडेट के साथ कि हमले की जांच शुरू हो गई है। प्रभात ख़बर में ये ख़बर सिरे से ग़ायब, जैसे ऐसी कोई घटना हुई ही न हो। दैनिक भाष्कर ने भी इसे बहुत तवज्जो नहीं दी। दैनिक जागरण में ख़बर को दूसरे पन्ने पर जगह दी तो वहीं राष्ट्रीय सहारा ने डिटेल खबर अंदर के पेज में डाली।

मतलब ये की अगर इन अखबारों के भरोसे रहे तो सच आपतक पहुंचेगा ही नहीं। हिंदी अखबारों से बेहतर खबरें अंग्रेजी समाचार पत्रों में दिखी। टेलीग्राफ ने फ्रंट पेज पर बॉटम की ख़बर ली लेकिन पाठक वर्ग का कितना हिस्सा अंग्रेजी का अखबार पढ़ता है ये सभी जानते हैं। दूसरी ख़बर – रांची की सीबीआई कोर्ट द्वारा तेजस्वी यादव सहीत अन्य नेताओं को जारी नोटिस पर हाई कोर्ट ने रोक लगाई। इस नोटिस की खबरें कितनी प्राथमिकता से उठाई गई थी ये सभी को याद है लेकिन इस नोटिस पर रोक ख़बर न बन सकी। एक बात समझ लेना ज़रूरी है कि रिपोर्टर की खबरें छपे या न छपे ये आजकल मैनेजर टाईप संपादक (यही प्राणी शासन और मीडिया संस्थान के बीच की चीज़ें मैनेज करता है) तय करते हैं। धन्यवाद दीजिये सोशल मीडिया को जहां ये बीच का प्राणी नहीं पाया जाता। विज्ञापन का लेमनचूस असर दिखता है। मीडिया हाउस चलाने के लिए मज़बूरी बन चुका ये लेमनचूस अखबारों को बंधक बना चुका और कुछ हैं कि उन्हें दूध पिलाने से फ़ुरसत नहीं।

नोट – किसी भी मीडिया हाउस में कार्यरत बंधु मेरे भाई हैं और एक रिपोर्टर को सबसे ज्यादा तकलीफ़ तभी होती है, जब सच छपती नहीं.. छिपाई जाती है।

(  पत्रकार शशि भूषण के वाल से साभार )

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