चारा घोटाला में ‘ लालू प्रसाद ‘ को सजा हुई. जगन्नाथ ‘ मिश्रा ‘ रिहा कर दिये गये. फिर सजा पाने वालों में जगदीश ‘शर्मा ‘ कौन हैं. रिहा होने वालों में विद्यासागर ‘ निषाद ‘ क्या हैं? न्यायालय के निर्णयों पर अपने राजनीतिक फायदे के लिए सवाल उठाने वालों, जरा बताएंगे कि क्या जाति सिर्फ नेताओं की होती है, अधिकारियों की नहीं ? सजा पाए अधिकारियों में कितने अगड़े-कितनी पिछड़े हैं, इसका मूल्यांकन करने में परेशानी क्यों ? क्योंकि इससे आपका राजनीतिक हित नहीं सधता!! 


जरा सजा पाने वालों की लिस्ट देखिए. उसमें आपको कई सिंह, अग्रवाल, झा, जोशी, सिन्हा टाइटल वाले भी दिख जाएंगे.


अब लालू प्रसाद पर. कल से चर्चा है लालू प्रसाद ने पिछड़ों के लिए यह किया, वह किया. तो फिर क्या देश की जनता ने इसके लिए उनको सरकारी खजाने की लूट का लाइसेंस दे दिया. नहीं न, तो फिर गलत को सजा मिली तो इतनी हाय-तौबा क्यों..!!
चर्चा तो इस पर होनी चाहिए थी कि निर्णय आने में 21 साल का इतना लंबा इंतजार क्यों लग गया ? सामान्यतः ऐसे मामलों में आम आदमी से लेकर अधिकारियों को उम्रकैद की सजा हो चुकी है. ऐसा इसलिए की यह राजनीति से जुड़ा मामला था. आरोपियों की लिस्ट देख लीजिए तो पता लगेगा कि चारा घोटाला के इस केस में कुल 38 आरोपी थे, जिनमें से 11 की सुनवाई के दौरान ही मौत हो गई जबकि महज दो ने जुर्म स्वीकार किया. तीन आरोपी सरकारी गवाह भी बने.
न्यायालय के निर्णय के बाद आमतौर पर लोगों के न्यायाधीश बन जाने की परंपरा रही है. कल तक 2जी स्कैम में ए राजा और कनिमोई की रिहाई पर सवाल खड़ा करने वाले भी लालू प्रसाद सहित चारा घोटाले में हुई सजा पर सवाल खड़े कर रहे हैं.
जानता हूं, इस पोस्ट के बाद मेरी ID का सरनेम देखकर कुछ लोग ‘ अगड़ी ‘ सोच का करार देने की कोशिश करेंगे, लेकिन क्या आपकी सोच अभी तक ‘पिछड़ी’ नहीं है. अब भी आप जातीय दलदल के उस पुराने दौर से गुजर रहे हैं, जहां महज जातीय संतुष्टि के लिए खून खराबा तक हो जाया करता था.
बिहार को अब तक पिछड़ा कहने वाले इसे ऐसे ही पिछड़ा नहीं कहते. इसके पीछे हमारी पिछड़ी सोच अधिक जिम्मेवार है. खैर राजनीति के लिए प्लेटफार्म तैयार कर चुके लोगों से निवेदन है कि सजा पाने वाले अधिकारियों की जाति भी विश्लेषित करें, ताकि आपके सामाजिक न्याय को समझने में आसानी हो.

( पत्रकार सुमित सिन्हा के वाल से साभार )

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