नौलखा महल
यह बिहार के और भारत के उस धरोहरों में से एक है जिनकी महत्वता ने उनका नाम इतिहास में दर्ज करा दिया। भारत में ऐसे कई किले, उद्यान और जगह हैं जिन्हें विश्व विरासत में जगह मिली है। वहीं कुछ ऐसे भी हैं जो इस सूची में शामिल होने की क्षमता रखते हैं। आज की कड़ी में हम आपको बिहार मिथिला क्षेत्र के मधुबनी के नौलखा महल के बारे में बता रहे हैं, 1934 के भूकम्प में यह दरक गया। भूकंप के बाद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी इसे देखने आए थे। इसके बाद दरभंगा राज के 22वें महाराज कामेश्वर सिंह ने पुनः इसे सवारा मगर कुदरत को यह भी मंजूर नहीं हुआ। 1988 में आयी भयंकर भूकंप में यह महल फिर से ध्वस्त हो गया उसके बाद तो इस खंडहर को कोई भी सवारने का प्रयास तक नहीं किया !
स्थापत्य कला के बेहतरीन नमूने में से एक इस महल और अपने स्वर्णिम अतीत के रहस्यों को समेटे इस परिसर को आज भी किसी ऐसे की तलाश है जो इसका उद्धार कर सके।

अकसर टीवी, रेडियो और अखबारों में लोगों को नौलखा हार की बातें करता हुआ सुना होगा, अमिताभ बच्चन साहब के शराबी फिल्म में एक गाना बहुत लोकप्रिय हुवा था ” मुझे नौलखा माँगा दे ओ सैया दीवाने” लेकिन क्या कभी किसी नौलखा महल के बारे में सुना है।
सुनकर आप भी हैरान रह गए ना, आखिरकार नौलखा महल कैसे हो सकता है। दरअसल ये जगह बिहार के उस हिस्से में बसती है जहां से मिथिला समाज की शुरूआत होती है। बिहार के मधुबनी जिले के राजनगर में इस पैलेस का निर्माण 17वीं शताब्दी में हुआ था।

कहा जाता है की इस महल और भव्य मंदिर को बनवाने के लिए महाराजा रामेश्वर सिंह ने 17वि सतबादी में 9 लाख चाँदी के सिक्के खर्च किये थे इसलिए इस महल का नाम नौलखा मंदिर पड़ा,
इस महल का मुख्य आकर्षण महल का हाथी पर बनाया जाना है , पूरा महल हाथी के आकर के विशाल पिल्लर पर बना है , जहाँ जहाँ भी पिल्लर की जरुरत थी वहां वहां विशाल हांथी बनाया गया ओर उसके ऊपर पूरी महल को एक भव्य रूप देकर निर्माण करवाया गया है,

बिहार के राजनगर में स्थित नौलखा महल बिहार की हेरिटेज साइट्स में से एक है। इस महल का निर्माण दरभंगा के महाराजा रामेश्वर सिंह द्वारा किया गया। सन 1934 में आए भूकंप में यह महल बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था, जिसके बाद इसका पुनः निर्माण किया गया।

महल के सामने दुर्गा भवन का मंदिर स्थित है। ऐसा कहा जाता है कि महाराजा रामेश्वर सिंह की मां काली के भक्त थी , इसलिए उन्होंने इस मंदिर का निर्माण करवाया। मंदिर के ठीक सामने एक तालाब भी बना हुआ है। जिसके बारे में कहा जाता है कि महारानी के कमरे तक इसी तालाब के जरिए पानी आता था।

नौलखा मंदिर के बीचो-बीच सात मंजिला इमारत स्थित है, जिसके ठीक बगल में एक तालाब बना है। इस महल के बारे में बताया जाता है कि महाराजा की छोटी और बड़ी महारानी के लिए तालाब खोदा गया था।

इसके अलावा कमला नदी के पास मां काली मंदिर और मां दुर्गा को समर्पित राजनगर पैलेस यहां का मुख्य पर्यटक स्थल है। रहस्य और रोमांच को अपने आगोश में समेटे इस राजनगर महल की स्थापना दरभंगा राज के 21वें महाराज रामेश्वर सिंह ने की थी। वो तन्त्र विद्या में सिद्धहस्त थे और उन्होंने इसी विधा के सहारे राजनगर में देवी-देवताओं के मन्दिरों से अटे पड़े इस परिसर का निर्माण 19वीं शताब्दी के अंत में कराया था।

परिसर में स्थित सभी मंदिरों में तन्त्र की देवियों की मूर्तियां स्थापित हैं। इनकी पूजा दक्षिण दिशा में होती है क्योंकि सभी मंदिर दक्षिणामुखी है। इसके अलावा यहां संगमरमर से बनाया गया काली मंदिर भी बड़े आकर्षण का केंद्र है। मंदिर के अंदर मां काली की भव्य मूर्ति है जो काले पत्थरों से निर्मित है। साथ ही मन्दिर के पास अष्टधातु निर्मित एक विशाल घण्टा भी है। परिसर में मां काली के अलावा मां दुर्गा, मां कामख्या और मां गिरजा के मन्दिर है।

इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा की इतनी प्राचीन और अद्भुत कला और वास्तु के संगम से बनाया गया नौलखा महल जहाँ जिसके कैंपस में भव्य और विशाल मंदिर बना है वो सब आज खड़हर में तब्दील हो चूका है इस धरोहर को सुरक्षित रखने के लिए आज तक न तो बिहार सरकार ने या न ही भारत सरकार ने कभी पहल की , अगर इस महल और भव्य मंदिरो को सही से रखरखाब होता तो आज ये पर्यटकों को खींच ले आती

हलांकि ये राजमहल और परिसर अभी भी देखने लायक है। राजनगर, मधुबनी जिला मुख्यालय स करीब 7 किलोमीटर उत्तर में है और मधुबनी-जयनगर रेलवे लाईन यहां से होकर गुजरती है। यह मधुबनी-लौकहा रोड पर ही स्थिति है और यातायात के साधनों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

 

 

 

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