देशरत्न डॉ राजेंद्र बाबू

देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद की आज रविवार को 133वीं जयंती मनाई जा रही है। देश के राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनके जन्म जयंती के अवसर पर उन्हें याद किया है।

राजेन्द्र बाबू को श्रद्धासुमन अर्पित करते राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद

बिहार के गौरव डॉ राजेंद्र प्रसाद का जन्म 3 दिसंबर, 1884 को सीवान जिले के जीरादेई गांव में हुआ था। उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम और भारतीय संविधान के निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था। पूरे देश में लोकप्रिय होने के कारण उन्हें देशरत्न कहकर पुकारा जाता था। सन् 1962 में उन्हें “भारत रत्‍न” की सर्वश्रेष्ठ उपाधि से सम्मानित किया गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किए

यह है उनकी कुछ प्रसिद्ध पुस्तकें
राजेन्द्र बाबू ने अपनी आत्मकथा के अतिरिक्त कई पुस्तकें भी लिखी जिनमें बापू के कदमों में (1954), इण्डिया डिवाइडेड (1946), सत्याग्रह ऐट चम्पारण(1922), गांधी जी की देन, भारतीय संस्कृति व खादी का अर्थशास्त्र इत्यादि उल्लेखनीय हैं। राजेंद्र प्रसाद दो साप्ताहिक मैगजीन भी निकालते थे। हिंदी में निकलने वाली मैगजीन का नाम ‘देश’ और अंग्रेजी में निकलने वाली मैगजीन का नाम ‘सर्चलाइट’ था।

डॉ राजेंद्र प्रसाद के विचार
राजेंद्र प्रसाद का कहना था कि देश को विकसित बनाना है तो इसके लिए हमें एक ऐसे चरित्र की आवश्यकता है जो आसानी से उन प्रलोभनों से पराजित न हो जो हमें घेरे हुए हैं। उन्होंने कहा कि हमें एक ऐसे चरित्र की आवश्यकता है जो त्याग करने के लिए तत्पर रहे, जो अपार कठिनाइयों के बावजूद सच्चाइयों में दृढ़ रहे। एक ऐसा चरित्र जो हमें यह सामर्थ्य प्रदान करे कि हम दूसरे लोगों के हृदय में पैठ सकें और उनके दुख और दर्द को अपना बना सकें। जो सर्वदा लेने की बजाए देने के लिए तत्पर रहे ऐसा चरित्रशील व्यक्ति ही सुखी व संपन्न होगा और दूसरों को भी सुखी व संपन्न करेगा।
कहते है कि जब अम्बेडकर जी संविधान की रचना किए थे तो उन्होंने सभी महापुरुषो को पढ़ने के लिए दिए, संविधान लागू होने से पहले बीच से 32 पेज कही किसी फाइल मे दब गई । अब सबमे बेचैनी होने लगी, अम्बेडकर जी को दोबारा लिखना पड़ेगा तभी वहां राजेंद्र बाबू पहुंच गए उन्हें इस बात का पता चला तो उसने कहा मुझे याद है और उसने पुरे 32 पेज टाइप करवा दिए ।।
कुछ दिन बाद वो 32 पेज भी मिल गया तो दोनो को मिलाया गया तो उसमें एक कोमा का भी फर्क नही था ।

राजेन्द्र बाबू के बचपन का एक और किस्सा बड़ा प्रसिद्ध है।वह अपने समय मे इतनी मेधावी छात्र थे कि इनके कॉपी चेक करने वाले ने कहा-. ” Examinee is better than examiner.”तो ऐसे कुशाग्र बुद्धि के थे हमारे बिहारी बाबू ।।

28 फरवरी 1963 में उनका निधन हो गया। डॉ राजेंद्र प्रसाद एक महान देशभक्त, सादगी, सेवा और त्याग की मूर्ति थे जिनको देश आज भी बहुत गर्व से याद करता है।

शत शत नमन बिहार के इस महान सपूत को

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