फणीश्वरनाथ रेणू जी ने ‘मैंला आँचल’ में एक जगह पूर्णिया के नील गोदाम का जिक्र करते हुए लिखा है कि – जब भी  गाँव का कोई नौजवान बियाह के बाद गौना करवा कर अपनी दुलहिन लेकर लौटता था तो रास्ते में पड़ने वाले नील गोदाम के पास पहुँचते ही कहता था कि गाड़ीवान….गाड़ी को जरा धीरे हाँको….दुलहिन नील गोदाम का हौज और साहब की कोठी देखना चाहती है । सुनते ही दुलहिन थोड़ा सा घूँघट सरका कर ……..ओहार हटा कर देखती ….. यहाँ तो इंटो का ढेर है………..कोठी कहाँ है……। Indigo

नौजवान कहता  – देखो, वह है नील महने ( मथने ) का हौज….।वही हौज जिसमें कि अंगरेजी राज ने भारतीय किसानों के लाल रक्त को नीले रंग में बदल डालने की जैसे कसम खाई थी। …… अबकी गाँव जाने पर उसी नील महने के हौज के बगल से गुजरते समय नील गोदाम की तस्वीर खींच रहा था कि तभी एक शख्स पास आ कर खड़े हो गए। पूछ बैठे……आप पत्रकार हो क्या ?

नहीं भई….पत्रकार फत्रकार कुछ नहीं हूँ…….बस गाँव आया हूँ…….यहीं बगल में आया था…… घूम घामते इस नील गोदाम के करीब आ गया……सो…. तस्वीरें इसलिए ले रहा हूँ…….।

लेकिन मेरी समझ में यह नहीं आ रहा कि खंड़हर की तस्वीर में कौन चीज है जो आप इसे हींच रहे हैं।

बस ऐसे ही हींच रहा हूँ ……अच्छा लगता है…..।

Neel Godam
Neel Godam

NeelGodam

वो तो ठीक है…..लेकिन देख रहे हैं सब गाँव वाले हग-मूत कर खराब कर दिए हैं………। सुबह आइए तो देखिए कि कैसे अंगरेज लोग को भारत वाले उनके ही नील गोदाम पर बैठ सलामी देते हैं।

सलामी…….. क्या बात कही……बातों ही बातों में नील गोदाम की तस्वीर खींचने लगता हूँ। याद आता है कहीं कुछ पढ़ा हुआ कि …… नील बनाने की प्रक्रिया के तहत नील की पत्तियों को इस पानी भरे हौज में डालकर सडाया जाता था……सड़ाने के बाद मथा जाता था और उसी दौर में निकलता था नील…….वही नील जिससे उठी ललकार ने भारत को पराधीन तंत्र से स्वाधीन तंत्र की ओर चलने हेतु अधीर कर दिया ।

तस्वीरें लेते समय मैंने ध्यान दिया कि नील गोदाम से ही सटा  है एक कुँआ…….. जिससे कि पानी खींचकर नील मथने वाले हौज को भरा जाता होगा…….। कुँएं के मोटे-मोटे छूही ( घिरनी- स्तंभ ) को देख अंदाजा लगाता हूँ कि कितना सारा पानी इस कुँए से रोज खींचा जाता होगा ।

Neel Godam
Neel Godam

नील गोदाम के बगल से सटी सड़क देख पता चलता है कि नील व्यापार के लिए  ही इस सड़क यातायात का समुचित प्रबंध किया गया होगा ताकि नील की फसल लिए बैलगाड़ीयों को नील गोदाम तक पहुँचने में आसानी हो और यहाँ से नील बाहर भेजी जा सके।

उधर नील गोदाम का परनाला पहली ही नजर में कुछ  विशिष्ट किस्म का लग रहा है…..तीन मुहाने और तीनों अलग अलग आकार के…….  आस पास सटे हुए।

चंपारण में सन् 1917 में गाँधी जी ने नीलहे अंग्रेज अफसरों द्वारा किसानों से जबर्दस्ती तीन कठिया प्रणाली के तहत नील उगवाने का जमकर विरोध किया था …….तीन कठिया प्रणाली…..यानि कि  हर किसान को अपनी जमीन के 3/20 हिस्से पर नील उगाना जरूरी।

इस प्रणाली को बनाए रखने के लिए….. नील  उगाने के लिए….. किसानों को नीलहे अंग्रेज अफसरों ने महंगे ब्याज पर कर्ज दिया……..एक ओर अनाज की बजाय…….जबरी नील उत्पादन करवा कर शोषण…..दूसरी ओर   लिया हुआ कर्ज…… हालत यह थी कि एक बार लिया हुआ कर्ज गले की फांस बन कसता जाता…..कसता जाता……. ठीक हमारे वर्तमान में विदर्भ क्षेत्र के कपास उगाने वाले किसानों की तरह नील किसान भी छटपटाते रहते  । आज, फिर हालात वही है…… हमारे इन कपास उत्पादक किसानों को भी सरकार अच्छा खासा कर्ज दे रही है….खुलकर…..लेकिन यह कर्ज कब और कैसे लौटा पाएंगे किसान…… इसकी किसी को फिक्र नहीं है। फिक्र है तो उन सरकारी आँकड़ो की कि, जो सहायता राशि के नाम पर कागजों में चुप्पे से उतर आती है और रजिस्टरों में आराम फरमाती है…..यह कहते कि हमने तो गरीब किसानों की सहायता ही की है…….अब कोई और किसान आत्महत्या करे तो हम क्या करें………… सहायता राशि……….मरणोपरांत  कागज के फूलों में बदल जाती है।

Neel Godam

वैसे, नील युग का अवसान होने के कारणों में जहाँ एक ओर जर्मनी द्वारा नये किस्म के रासायनिक रंगों का अविष्कार था तो दूसरी ओर  1917 में चंपारण में गाँधीजी द्वारा चलाया गया नील आंदोलन……..विरोध इतना तगड़ा था कि अंग्रेज पीछे हटने पर मजबूर हुए। बीरभूम, पाबना, खुलना आदि इलाके नील विरोध के मुखर क्षेत्र थे।   उधर जर्मनी के सस्ते और विविध रंगों ने भारतीय प्रणीली से बनने वाले नील के बाजार को ध्वस्त करना शुरू कर दिया दिया था …..धीरे धीरे नीलहे अंग्रेज साहबों की कोठियों पर भंभ ररने लगा……..और एक वह भी समय आया कि नीलहे किसानों ने अपनी विजय पताका फहरा दी………….भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक सफल युद्ध।
Neel Factory
Neel Factory

परंतु  वर्तमान में विदर्भ के कपास उत्पादक  किसानों की  जो हालत है…… कभी वही हालत नील की फसल उगाते किसानों की भी रही थी। उस समय संगठित विरोध का स्वर विदेशीयों के प्रति था…….. अब …….अब किसका तो विरोध किया जाय और किसका समर्थन……कुछ समझ नहीं आता……। परिस्थितियां गड्डम गड्ड हैं……..हमारी ही सरकार…..हमारे ही लोग…..लेकिन फिर भी किसानों की आत्महत्या रूकने का नाम नहीं ले रही। गरीबी, सहायता, मौत, मुआवजा……इस सब का कुचक्र चल ही रहा है……जो चीज पहले हो रही थी….अब भी वही हो रही है…..बस रंग बदल गया है……पैकिंग वही है…..।

तनिक इन दो चित्रों को देखिए….एक में नील है……दूसरे में कपास ….. दोनों ही चीजों के बाँधने का तरीका एक समान ही है…….।  अगर हालात कुछ नहीं बयां करते हैं तो कोई बात नहीं…..लेकिन यह जालीदार पैकिंग तो बहुत कुछ बयां कर रही  है । नील भी उसी तरह पैक की जाती थी…..कपास भी।
cotton bale
Cotton bale
Indian Indigo dye Lump
Indian Indigo dye Lump
अब चंपारण केवल बिहार में ही नहीं है…..भारत के हर राज्य में है…..। अफसोस, भारत में फैले इन तमाम  चंपारणों को चेताने के लिए……ललकारने के लिए कोई राजकुमार शुक्ल जैसा किसान नहीं है …….कोई गाँधी नहीं है….कोई ललकारता देहात नहीं है।
Disclaimer: ये ब्लॉग सतीश पंचम जी के ब्लॉगस्पोट के ब्लॉग सफेद घर से लिया गया है.
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