ग्रामीण समाज के बदलाव की आहट है ये !!

एक ज़माना था जब शारदा सिन्हा बिहार कोकिला के नाम से जानी जाती थीं. बिहार के गाँव से लेकर शहर के मंदिरों में ‘जगदम्बा घर में दीयवा बार अयनीं हे’ सुबह सुबह नियमित तौर पर बजा करता था. शादी ब्याह के दिनों में शारदा सिन्हा के विवाह गीत पूरे बिहार में विवाह के समय बजने वाले गीत हुआ करते थे. तब जीवन की सुबह शाम पारम्परिक हुआ करती थी. हालांकि, बिहार से मजदूरों का पलायन शुरू हो चुका था, लेकिन शहरों में रहकर पर्व त्योहारों पर गाँव आने वाले उन मजदूरों का प्रभाव गाँव की आबोहवा पर नहीं था.
लेकिन 90 के बाद बिहार के जनजीवन में जबरदस्त परिवर्तन आया. गाँव के मानिंद माने जाने वाले लोग हाशिये पर जाने लगे और हाशिये के लोग मुख्यधारा में बहने लगे. शालीनता की जगह उदंडता मुखर होने लगी. इस बदलाव को सामाजिक विश्लेषकों ने सामाजिक परिवर्तन का नाम दिया. प्रदेश के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव सामाजिक बदलाव के पुरोधा माने गए. लेकिन यह बदलाव समाज की सांस्कृतिक विरासत और संरचना को किस तरह तार तार कर रहा था, इस पर किसी का ध्यान नहीं गया, और सांस्कृतिक मिठास कब शोर में बदल गयी, पता ही नहीं चला. जब पता चला तबतक काफी देर हो चुकी थी. इस बीच पंद्रह साल गुजर गए.
पंद्रह साल बाद राज तो बदला, लेकिन समाज बदल नहीं सका, क्योंकि बदलते समाज की नाव की पतवार संभालने युवा गाँव छोड़कर जा चुके थे. इसलिए ग्रामीण समाज में जबरदस्त बदलाव अराजक सा हो गया.
लेकिन आज जो हाल है, देश के बड़े बड़े शहरों का, गाँव फिर से उम्मीद के टीले के तौर पर टिमटिमाने लगे हैं. पढ़े लिखे युवा एक बार फिर अपने गाँव को बेहतर बनाने की सोचने लगे हैं. गाँव एक और बदलाव के मुहाने पर है. लडकियां पढ़ लिख कर घरों से बाहर निकलकर करियर बनाने लगी हैं. लड़कियों के बाप-दादा भी लड़कियों को लड़कों जैसा आजाद और आत्मनिर्भर जीवन देना चाहते हैं. सरकार ने ग्राम पंचायतों में महिलाओं को जो पचास प्रतिशत की भागेदारी दी है, उसका भी असर समाज पर दिखने लगा है. शराबबंदी और अपराध पर नियंत्रण ने आम ग्रामीणों के भीतर भरोसा जगाया है कि जीवन किस्मत के भरोसे नहीं है, बल्कि इच्छाशक्ति से उसे बदला जा सकता है, अपने अनुरूप बनाया जा सकता है. आज ही एक खबर पढने को मिली कि बिहार के एक गाँव के लोगों ने सामुहिक फैसला लिया है कि अब गाँव में श्राद्धभोज की परम्परा ख़त्म की जाती है, क्योंकि अमीरों के लिए जहां यह दिखावे का माध्यम बन गया है, वहीं गरीबों के लिए अभिशाप का फंदा बना है. मेरे खुद के ही गाँव में मेडिकल कैंप लगाये जा रहे हैं, गरीबों को कम्बल बांटे जा रहे हैं.
इस तरह के सकारात्मक बदलाव अभी तो बानगी भर हैं, लेकिन परिवर्तन का हाईवोल्टेज करंट अपने अन्दर छुपाये हुए है. और मुझे यकीन है कि आनेवाले 10 – 20 सालों में गाँव भारत के बदलाव की असली कहानी कहने लगेंगे. रीजनल सिनेमा भी बदलेगा. इसलिए भोजपुरी फिल्मों में जो कचरा बह रहा है, पचास से अधिक सिनेमाघरों के बंद होने की खबर है, उससे निराश होने की आवश्यकता नहीं है. नयी भोर से पहले का अन्धेरा है यह.
Dhananjay Kumar

(धनजय जी के फेसबुक वाल से साभार  )

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