अक्सर विवाह शब्द सुनते ही कुंवारे लड़कों के चेहरे तीस पईसी मुस्कान आ ही जाता है. मां बाप भी उपयुक्त समय देखकर योग्य बहू की तलाश शुरु कर देतें है, भले अपना बचबा भर दिन में गोल्ड फ्लेक की तीन डब्बी, चिलम और विजय माल्या वाला किंगफिशर सुरूक के घूमता हो, लेकिन बहू चाहिए आलिया भट्ट. उससे कम तनिकों पसंद नहीं. लईका के पास भी पांचो ऑपशन (none of these सहित) होता है कि किसे इंटरव्यू के लिए सेलेक्ट करना है और किसे रिजेक्ट. फुआ-दादी, चाची-मामी सब का योगदान इंटरव्यू के आयोजन में उपयुक्त होता है, एक पैर कब्र में और दूसरे पैर के बदले लाठी के सहारे चलने वाली लड़के की 90 वर्षीय नानी लड़की के शरीर पर पाईथागोरस प्रमेय लगाकर कर्ण, आधार और लंब की लंबाई नाप-जोख रही होती है. बस एक स्केल लाना भूल गई होती है. इडेन गार्डेन की क्रिकेट पिच की तरह पूर्ण निरीक्षण के पश्चात, फिर भी वर पक्ष के पास ये ऑथोरिटी होता है कि जाते वक्त मुंह पर यह मोहर मार सके की यू आर सिलेक्टेड OR यू आर रिजेक्टेड. विडंबना देखिए इसके लिए पूरे समाज में आम सहमति है. हम सभी जानते है, स्वीकारतें है, विवाह के इस स्वरूप को. ये आम विवाह है.

लेकिन, आज विवाह के एक दूसरे स्वरूप को देखतें है. पिछले तीन-चार दिनों से अपना बिहार एक बार फिर से पकड़ौवा विवाह के कारण चर्चा में है.

शास्त्रानुसार विवाह के आठ प्रकारों में से यदि युद्ध के मैदान में विजयी होकर किसी लड़की को हर कर लाना और उससे विवाह करना राक्षस विवाह कहलाता है. हमारे बिहार में भी जबरदस्ती लड़के का अपहरण कर जबरदस्ती कराए गए इस विवाह को पकड़ौआ विवाह की संज्ञा देतें है, पकड़ौआ विवाह की बात करें तो लड़के को बन्दूक की नोंक पर उठा लिया जाता है और गन प्वाईंट के साए में अगवा किए गए लड़कों का विवाह लड़की से करा दिया जाता है, भले लड़की की भी मर्जी हो या न. हो गई शादी. लो संभालो, आज से ये तुम्हारी अमानत है, और विदाई करा के न ले गया तो मुंगेरी कट्टा देखे हो गुरु. उधर बिल्टू, सिंटू, मिंटू, चिंटू टाईप मुहल्ले के टिनही हीरो आसमानी फायर कर के सलामी-कम-धमकी दे रहे होते है. पर ये भी सत्य है कि पकड़ौवा विवाह की अस्सी फीसदी से अधिक घटनाओं में लड़के के रिश्तेदारों की भी अहम भूमिका होती है. पर सवाल ये है कि क्या इसे विवाह माना जाए?

विवाह का मतलब ये नहीं कि कहीं भी, कभी भी, किसी से, जबरदस्ती करा दिया जाए. यह ऐसा मौक़ा होता है जब दो इंसानो के साथ-साथ दो परिवारों का जीवन भी पूरी तरह बदलने वाला होता है। हमारे वैदिक कल्चर के सोलह महत्वपूर्ण संस्कारों में से विवाह भी एक है, जिसके बिना मानव जीवन पूर्ण नहीं हो सकता। शाब्दिक अर्थ भी अगर हम विवाह का देखें तो, वि + वाह। “विशेष रूप से (उत्तरदायित्व का) वहन करना”। एक दूसरे की रिस्पेक्ट करना, प्यार, दुलार सभी सम्मिलित तत्व है. अन्य संस्कृतियों में विवाह पति और पत्नी के बीच एक करार या कॉन्ट्रैक्ट कहें, के समान होता है, जिसे कि विशेष परिस्थितियों में तोड़ा भी जा सकता है, परंतु सनातन संस्कृति में ऐसा नहीं है, विवाह पति और पत्नी के बीच जन्म-जन्मांतरों का सम्बंध होता है, एक रिस्पॉंसिबलिटी होती है, जिसे किसी भी परिस्थिति में नहीं तोड़ा जा सकता। यह सच में सहिष्णुता सिखाता है, भले आपस में मतभेद हो, एक दूसरे का आदर किया जाए अंततः इसे सुलझाया जा सकता हैं.

लेकिन, पकड़ौआ विवाह की बात करें तो क्या इसे विवाह माना जाए? जैसा कि आमतौर पर देखतें है कि इसका शिकार हुआ लड़का भले गनप्वाईंट पर उस समय निर्देशानुसार रस्म में भाग तो ले लेता है, वैदिक रूप से शादी तो हो जाती है, सोचिए उस समय लड़के और लड़कियों पर क्या बीतती होगी, बस गार्जियन के दवाब, में दोनों इस प्रक्रिया में भाग लेतें है, डरा धमकाकर लड़की को भी ससुराल में पहुंचा दिया जाता है कि लो अब संभालो. लेकिन कहानी केवल एकता कपूर की सीरियल के जैसी नहीं होती है, कि ससुराल पहुंचते ही बहु ने मोर्चा संभाल लिया. असली मुसीबतें यहां से सामने आती है.

क्या कभी भी वह मन से अपने जीवनसाथी को अपना पाता/पाती है ? औसतन यहीं देखा जाता है लड़के के मन में वहीं चल रहा होता है कि जैसे उसे विवाह के समय जबरदस्ती मारा पीटा गया था, दुर्व्यवहार किया गया था वो भी वैसे ही लड़की के साथ भी करेगा। प्यार कभी पनप भी नहीं पाता है, नफरत के बीज तो रिलेशन जोड़ते समय भी बो दिए जाते है, फिर उसके पश्चात अक्सर हमे यहीं सुनने को भी मिलता है कि दुल्हन से मारपीट, दहेज के मामले, सेक्स स्लैव की तरह की बिहेव किया जाना, तमाम तरह की न्यूज आती है. सोचिए उपरोक्त प्रक्रिया, जिससे दोनो का जीवन नरकीय हो जाता, उस लड़के /लड़की का क्या कसूर होता है?

शायद आज से पचीस-तीस साल पहले शायद दबंगों की दबंगई के दम पर, लॉ एंड आर्डर को ताक पर रखकर ये संभव होता रहा होगा. लेकिन आज 21वीं सदी में हम है, योग्य लड़कों का अभाव नहीं है, यदि वधू पक्ष ये सोचकर खुश होतें है कि हम दबंग है, हमरे पीछे दूनाली वाला घूमता है, जो चाहें कर लेंगे, तो यकीन मानिए आप अपनी उस पुत्री को परेशानी में डाल रहें है, जिसे आपने बचपन से पाला है, इसकी क्या गारंटी है कि आपकी पुत्री के साथ ससुराल में दुर्व्यवहार नहीं किया जाएगा. आप अपनी जिम्मेदारियों से जल्दी निपटने के चक्कर में इस तरह की गतिविधियों को अंजाम तो दे देतें है लेकिन भुगतना आपकी बेटियों को पड़ता है। इस प्रक्रिया से न तो पुत्री खुश होती है और ना ही वह लड़का जिसके साथ वह न चाहते हुए पूरा जीवन निर्वाह करना है। पूरा जीवन नरकीय हो जाता है, इससे अच्छा तो होता कि अपनी बेटियों को सशक्त करें, शिक्षित करें, इस योग्य बनाएं ताकि वों खुद अपने लिए योग्य वर तलाश कर सके और आप निश्चिंत हो चादर तान के सो सको।

आनंद कुमार,
सीतामढी

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