प्यार खोने की कशक कहो या सनकी आशिक पर एक बात तो है उस दर्द में की ये असंभव को संभव बना देती है। मां होना इस बात का ज्वलंत उदाहरण है। पर एक पुरुष अपने प्यार के लिए क्या कर सकता, क्या वो ऐसा कुछ कर सकता है, जो एक मिशाल बन जाए?

आज प्यार के दर्द के उस कशक को जानेंगे जो सिर्फ प्यार ही नहीं जिद, अथक प्यास के प्रयाय के रुप में जाना जाता है।

दशरथ मांझी-

ये किसी परिचय के मोहताज तो नहीं फिर भी,

बिहार के गया जिले के एक छोटे से गांव गहलौर से ताल्लुक रखने वाले दशरथ मांझी अपने बीबी बच्चों के साथ अच्छा समय काट रहे थे, इनका गांव नजदीकी शहर(बाजार) से एक पहाडी के 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित था, तो जाहिर सी बात है कि वहां मूलभूत सुविधाओं का अभाव होना लाजिमी है।

उनकी कहानी भी उसी पहाड से शुरु होती है और इन्हें अमर बना देती है।

पहाडी रास्ता जिसे दशरथ मांझी ने तोड़ के सुगम बना दिया

इनकी पत्नी फाल्गुनी देवी मांझी के तीसरे ब्च्चे की मां बनने वाली थीऔर वो प्रसव पीडा से कराह रही थी। उस वक्त गांव में न डॉक्टर होते थे (डॉक्टर तो आज भी मुश्किल से ही होते हैं) और न ही यातायात के ऐसे साधन ऐसे में मांझी अपनी पत्नी को लेकर उस 80 किलोमीटर का सफर कैसे तय के शहर के असपताल जाते, उन्होंने पहाडी ही पार करने का फैसला लिया पर कुछ ही दूर गये होंगे कि उनकी पत्नी फाल्गुनी से दर्द जीत गया और वो ये दुनिया छोड दी।

जब कोई अपना बिछडता है तो उस दर्द से बडा दर्द कोई और न होता है, और यहाँ तो मांझी की अर्धांगिनी ही चली गयी उनके पास जीने का कोई मकसद ही न बचा पर इसी बीच उस पहाड फाल्गुनी के खुन ने उन्हें जीने का मकसद दिया, उन्हे उस पहाड़ी से बदला लेने का मकशद। फाल्गुनी तो जा चुकी थी पर ऐसी बहुत सारी फाल्गुनी अब ही हैं जिनके रास्ते ये पहाड़ हर रोज आता है और तभी 1960 से सिर्फ एक छेनी और हथोड़े से उस पहाडी का सीना चीरना शुरु किया और तब तक न रुके जब तक पहाड़ी को जमीन की धूल न चटा दी।1960 – 1980 तक वो अकेले ही पहाड़ी 110 मीं लम्बी का सीना काटकर रास्ते का रुप दिए और अपनी पत्नी को श्रद्धांजलि दिए।

दशरथ मांझी का छेनी हथोड़ी ( औज़ार ) जिससे उन्होने पहाड़ को तोड़ दिया

इतने पर भी वो रुके नही उस गलियारे को रास्ते का रुप दिलाने के लिए सरकार के दरवाजों के चक्कर भी लगाए।

उनके एक जिद और 22 वर्षों के प्रयास का ही फल है कि आज गहलोर गां की दूरी शहर से 80 से किलोमीटर से घटकर मात्र 13 किलोमीटर ही रह गयी है।

Rinku Singh
Lakhisarai
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