बिहार के औरंगाबाद का कुटुंबा प्रखंड का चिल्हकी बिगहा गांव। यहां के 15 किसानों ने 20 बीघे में स्ट्रॉबेरी की खेती करते है । इसके अलावा भी उन्होंने दूसरी जगहों पर 15 बीघे में स्ट्रॉबेरी लगाई है। इस खेती में उनका करोड़ों का इन्वेस्टमेंट है। इसके जरिए वे अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। स्ट्रॉबेरी की खेती की राह यहां के लोगों को बृजकिशोर मेहता ने दिखाई थी।

हरियाणा के हिसार से वे स्ट्रॉबेरी की खेती देखकर आए थे और वर्ष 2013 में पहली बार सात पौधों से खेती शुरू की थी। दूसरे और तीसरे साल उन्होंने वृहद पैमाने पर खेती की और अच्छा मुनाफा हुआ। उनकी देखादेखी अन्य किसानों ने भी स्ट्राबेरी की खेती शुरू की। आज यह खेती व्यवसाय का रूप ले चुकी है और दर्जनों किसान इसमें लगे हैं। स्ट्राबेरी की खेती से चिल्हकी बिगहा गांव में खुशहाली आई है।

यहां के किसानों ने इस खेती को व्यवसाय के रूप में अपना लिया है। यहां के लोगों को अब बच्चों की नौकरी की चिंता नहीं है। अधिकतर बच्चे इस व्यवसाय में लगे हैं और उन्हें अच्छा मुनाफा हो रहा है। चिल्हकी बिगहा और नरहर अम्बा के किसानों ने प्रखंड के पोला और झारखंड में भी इसकी खेती की है। स्ट्रॉबेरी की खेती में एक बीघे में तीन से चार लाख की लागत आती है और उत्पादन पांच से छह लाख का होता है। एक बीघे की खेती में दो से तीन लाख रुपए का मुनाफा होता है। आए दिन यहां वरीय अधिकारी स्ट्रॉबेरी की खेती देखने आते हैं।

स्ट्रॉबेरी खेती की सबसे बड़ी समस्या स्टोरेज और मार्केटिंग की है। किसान न तो इसे खुद स्टोर कर सकते हैं और न ही इसके लिए सरकार की ओर से कोई व्यवस्था है। स्टोरेज के अभाव में उत्पाद औने—पौने दाम पर बेचना पड़ता है। अगर सरकार इस दिशा में कुछ प्रयास करे तो काफी आगे बढ़ा जा सकता है .

(Source- Hindustan)

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