बिहार के औरंगाबाद जिला स्थित देव मंदिर ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं पर्यटन के दृष्टिकोण से विश्व प्रसिद्ध त्रेतायुगीन पर्यटकों और श्रद्धालु की अटूट आस्था का केन्द्र है। इस मंदिर को दुनिया का इकलौता पश्चिमाभिमुख सूर्यमंदिर होने का गौरव हासिल है। इस मंदिर को अभूतपूर्व स्थापत्य कला, शिल्प एवं कलात्मक भव्यता का अद्भूत नमूना कहा जाता है। कहा जाता है कि इस मंदिर को कोई साधारण शिल्पी ने नहीं बल्कि इसका निर्माण खुद देव शिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने अपने हाथों से किया है। काले और भूरे पत्थरों की अति सुंदर कृति जिस तरह ओडिशा के पुरी में जगन्नाथ मंदिर और कोणार्क के सूर्यमंदिर का है, ठीक उसी से मिलता-जुलता शिल्प इस मंदिर का भी है।

देश में स्थित सभी सूर्य मंदिरों का द्वार पूरब दिशा की ओर है परंतु देव सूर्य मंदिर का द्वार पश्चिमाभिमुखी है। कहा जाता है कि औरंगजेब अपने शासनकाल में अनेक मूर्तियों एवं मंदिरों को ध्वस्त करते हुए देव पहुंचा। वह मंदिर तोडऩे की योजना बना रहा था कि लोगों की भीड़ एकत्रित हो गई। लोगों ने ऐसा करने से मना किया परंतु वह इससे सहमत नहीं हुआ।औरंगजेब ने कहा कि अगर तुम्हारे देवता में इतनी ही ताकत है तो मंदिर का द्वार पूरब से पश्चिम कर दें। ऐसा होने पर उसने छोड़ देने की घोषणा की। कहते हैं कि दूसरे दिन सुबह जब लोगों ने देखा तो मंदिर का प्रवेश द्वार पूरब से पश्चिम हो गया था। इसके बाद औरंगाबाद ने मंदिर तोडऩे का इरादा बदल दिया।

ऐसा माना जाता है की जब पुरे औरंगाबाद में पूरा का पूरा जंगल था । तब एक राजा एल नामक उस जंगल में शिकार खेलने गया। जिसका पूरा का पूरा शरीर में कुष्ठ रोग हुआ था ।और वह जब वह खेलते -खेलते थक गया तब उस राजा को प्याश लगा और वह अपने सैनिक को आज्ञा दिया की जाओ और मेरे लिए पानी लेकर आओ सैनिको ने पूरा जंगल घुमा लेकिन उनलोगो को कही भी पानी नही मिला। और वे पुनः वापस आ गये और राजा से कहा महराज पानी तो कहीं भी नही मिला तब राजा के पास ही एक गड्ढा दिखाई दिया और राजा स्वयं जाकर जैसे ही गड्ढा का पानी छुआ तैसे ही उसके हाथ का कुष्ठ रोग समाप्त हो गया। तब वह उसी गड्ढा में स्नान किया और उसका पूरा का पूरा कुष्ठ रोग समाप्त हो गया तब राजा ने एक रात वहीं बिताने का सोचा और वही सो गया तभी रात के सपने में उसे सूर्य देव ने कहा की मेरा तीन मूर्ति उसी गड्ढा में है जहा तुम्हे कुष्ट रोग से मुक्ति मिली थी उसे निकाल कर बाहर रख दो तभी एक जोर से आवाज आई और राजा का नींद खुल गया और वह उस तीनो मूर्ति का स्थापना किया और और मंदिर का निर्मान करवाया । और साथ में उस गड्डे को एक तलाब का आकार दिया ।

देव सूर्य मंदिर

छठ मेला के दौरान मंदिर के प्रति लोगों की विशेष आस्था होती है। यहां पर्यटन विभाग एवं जिला प्रशासन के प्रयास से प्रत्येक वर्ष सूर्य अचला सप्तमी को महोत्सव का आयोजन कराया जाता है। देव सूर्य मंदिर अपनी शिल्पकला एवं मनोरमा छटा के लिए प्रख्यात है। आपही पालनहार हैं क्षमा करहूं क्लेष, तीन रूप रवि आपका ब्रह्म, विष्णु, महेश।कार्तिक एवं चैत में छठ करने कई राज्यों से लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते है। सूर्यकुंड तालाब का विशेष महत्व है। छठ मेला के समय देव का कस्बा लघु कुंभ बन जाता है। छठ गीत से देव गुंजायमान हो उठता है। संस्कृति की प्रतीक सूर्यकुंड को गवाह मानकर व्रती जब छठ मैया और सूर्यदेव की अराधना करते हैं तो उनकी भक्ति देखने बनती है। यहां छठ में जाति एवं मजहब समाप्त हो जाता है।

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