1979 में मेरे बाबूजी का देहांत हुआ था और उसी वर्ष, कोई चार महीनों बाद अनुकम्पा के आधार पर मेरा स्थानांतरण भागलपुर हुआ। उन दिनों भागलपुर की स्थिति बहुत खराब थी। शहर में और आसपास के ग्रामीण इलाकों में डकैती, हत्या, बलात्कार की घटनाएं रोज सुनने में आतीं थीं। दो वर्ष पहले आपातकाल की समाप्ति पर हुए चुनाव में कांग्रेस मुँह की खायी थी और देश में जनता पार्टी का राज था। आपातकाल में बिहार अंगीठी पर रखे प्रेशर कुकर की तरह तप्त और तनावग्रस्त रहा था। प्रेशर कम होते ही उचक्कों, बाहुबलियों की बन आयी थी। जनता पार्टी के राज का उद्घाटन हमारे प्रान्त में बेलछी नर संहार से हुआ था।

1979 में पटने में राम सुंदर दास जी का राज था और भागलपुर के पूरब के ग्रामीण, ऐद्ध शहरी क्षेत्र में सुदामा मंडल का। भागलपुर शहर में किसी का एकछत्र राज नहीं था। जिसे मौका मिलता वही कुछ कर गुजरता था। 1979 के अंत तक माहौल ऐसा हो गया था कि सामान्य लोग अपनी बीवी बेटियों के साथ फिल्मों के इवनिंग शो (शाम के छः से नौ तक) देखने जाना बंद कर चुके थे। लूट-पाट, चोरी डकैती के वारदात रोज सुनने को मिलते थे, गांवों से आने वाले अंधेरा गिरने के पहले शहर के अपने काम निबटा कर घर पंहुच जाना चाहते थे। आठ बजते बजते बाज़ार सूना हो जाता और दुकानदार भी शटर गिराने को तत्पर दिखते। पूरे इलाके पर दहशत की गहरी धुंध छायी हुई थी।

मैं अक्टूबर 1979 में भागलपुर पंहुचा था। तीन महीने पहले, जुलाई में लाठी और वाईज़ ही बेधार अस्त्र से अंधा-धूंध मार एक गाँव के सात व्यक्तियों की हत्या कर दी गयी थी। उसके कुछ हफ्ते पहले दिन दहाड़े एक दूसरे गाँव को लूट कर पंद्रह लड़कियों पर बलात्कार हुआ था। शहर में लूट और बलात्कार के वारदात हर कुछ दिनों पर सुने जा रहे थे।

पुलिस चुप नहीं बैठी थी, अपराधी पकड़े जा रहे थे पर जमानत पर छूट कर फिर वही अंजाम दे रहे थे। और तब शहर के शीर्ष पुलिस अधिकारियों ने उन्हें अंधा कर देने का निर्णय लिया।

शहर रातो रात शांत हो गया। बड़ों बड़ों को अंधा होते देख छुटभैये अपराधी भी दुम दबा कर अपनी बिलों में छुप गए। 1980 की गर्मियों तक मियां बीवी स्कूटरों पर रात के एक बजे दिखने लगे – नाईट शो देख कर घर आते। सुदामा मंडल ने भी आत्म समर्पण कर दिया, कहते हैं अपने राजनैतिक आका की सलाह पर।

लगता था राम राज आ गया जब भागलपुर सेंट्रल जेल ने अंधे अंडर-ट्रायल्स की देखभाल के लिए अतिरिक्त कर्मचारी की मांग की। भांडा फूटा। भांडा फोड़ने का श्रेय इंडियन एक्सप्रेस को जाता है, उसके संवाददाता अरुण सिन्हा को। पुलिस ने कहा कि गाँव वालों ने अपराधियों को पकड़ कर उनकी आंखें फोड़ दीं थीं। बड़े बड़े हाकिम हुक्काम आये, बयान लिए गए और कुछ पुलिस कर्मियों को बर्खास्त कर दिया गया।

जनता का आक्रोश उमड़ा। भागलपुर बाजार बंद रहा, बन्द इतना सफल कि दिल्ली में लोगों को लगा कि इस बंद को सरकार का समर्थन है। जगन्नाथ मिश्र ने ऐसे किसी समर्थन का खंडन किया। बीबीसी का एक गोरा संवाददाता आया था (टली नहीं, उसका चेहरा मैं जानता था)।

जनता के जुलूस के सामने एक औरत चीख रही थी, “यदि पुलिस को कुछ हुआ तो भागगलपुर में खून की होली होगी।” उसके एक ही वक्ष था। दूसरे को बलात्कारियों ने जाते जाते काट दिया था।

( सचिदानंद सिंह जी के फेसबुक वाल से साभार )

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