हिन्दुस्तान ने एक से एक धुरंधर एथलीट दिए हैं। इनमें एक थे शिवनाथ सिंह। 11 जुलाई 1946 को बक्सर के मंझेरिया गांव में जन्मे शिवनाथ का बचपन गरीबी में बीता। पिता मामूली किसान थे। बेटे को एथलीट बनाना तो दूर, अच्छी तालीम दिलाना भी उनके वश में नहीं था। खेत की पगडंडियों का उपयोग शिवनाथ ने ट्रैक के रूप में किया.. जहां नंगे पांव दौड़ लगाकर पहले राष्ट्रीय फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई।

एथलेटिक्स में में जिनकों जरा सी भी रुचि होगी वह इस नाम से वाकिफ जरूर होगा। सत्तर के दशक में शिवनाथ सिंह जैसा लम्बी दूरी का एथलीट एशिया में नहीं था। पहले ट्रेक पर पांच किलोमीटर और दस किलोमीटर की दौड़ में एशिया के सभी एथलीटों को पछाड़ा फिर मैराथन में जुट गए।मनीला एशियन गेम्स (1973) में शिवनाथ सबसे पहले लोगों के दिलो दिमाग पर छाये, जब उन्होंने पांच व दस हजार मीटर दौड़ में सिल्वर मेडल जीते। इसकी भरपाई उन्होंने 1974 तेहरान एशियन गेम्स में सोना जीत कर दी। इस उपलब्धि पर उन्हें देश के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के साथ अर्जुन अवॉर्ड से नवाजा गया।

मांट्रियल ओलंपिक में शिवनाथ ने मैराथन में भाग लिया और 2:15:58 सेकेंड के समय के साथ 11वां स्थान हासिल किया। 72 प्रतिभागियों के बीच शिवनाथ 32 किमी तक चौथे स्थान पर थे। उनके साथ चार ओलंपिक स्वर्ण विजेता फिन लेसे विरेन दौड़ रहे थे, जिन्हें उन्होंने पछाड़ा भी, लेकिन टॉप थ्री में वे नहीं आ सके।ओलंपिक के बाद शिवनाथ ने 1978 में जालंधर में हुए मैराथन में वह दौड़ लगाई, जो अब तक रिकॉर्ड बुक में दर्ज होकर भारतीय धावकों के लिए चुनौती बना है। मैराथन में नंगे पांव दौड़ कर उन्होंने 2:12:00 सेकंड का समय लेकर बनाया था। इस रिकॉर्ड के नजदीक भी देश या राज्य का एथलीट नहीं पहुंच सका है।

इनकी उपलब्धि कुछ इस प्रकार है .. 1973 व 1975 एशियन चैंपियनशिप : चार रजत पदक ….. 1974 एशियन गेम्स : स्वर्ण पदक…….1976 मांट्रियल ओलंपिक : 11वां स्थान………..1980 मास्को ओलंपिक : प्रतिनिधित्व…….. 1978 कॉमनवेल्थ गेम्स, 1978 व 1982 बैंकाक, दिल्ली एशियन गेम्स में प्रतिनिधित्व …. पुरस्कार : अर्जुन अवार्ड और बिहार सरकार से लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड .

6 जून, 2003  को हमलोग को छोड़कर वो इस दुनिया से चल बसे .

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