महाराष्ट्र एवं कर्नाटक में जल संकट और भूजल की अप्रत्याशित कमी के कारण, केला खेती और खरीद उत्तरी भारत की ओर, मुख्यतः पश्चिम बंगाल और बिहार की तरफ आकर्षित हो रही है। बिहार इसमें अग्रणी भुमिका निभा सकता है ।

गंगा-कोसी-महानंदा, गंडक, बागमती, कछार एक जल बहुुुल क्षेत्र है और काफी समय सेे समृद्ध केला उत्पादक क्षेत्र रहा है और एक बृहत रूप में केला उत्पादन कर रहा है। बिहार के लगभग सभी जिलों में छोटे पैमाने पर केला खेती की जाती रही है।

मगर विभिन्न छोटे मुद्दों के कारण, बिहार के केला किसानों को कभी भी अच्छा राजस्व नहीं मिल पाया है जब की उनका उत्पाद मानकों के अनुरूप है।
अब तो बड़े बड़े कंपनियां ने भी बिहार की ओर रुख करना शुरू कर दिया है ।

केवेनटर एग्रो लिमिटेड, कोलकाता की एक कंपनी है जो खाद्य एवं पेय निर्माण में अग्रणी है। यह कंपनी बिहार से केला फल खरीदने के लिए सहमत हो गयी है।

केवेन्टर एग्रो लिमिटेड द्वारा अनुमानित 50 टन केला कच्चे फल की प्रति दिन की आवश्यकता को प्रथम रूप में प्रदर्शित किया गया है।

माननीय कृषि मंत्री, भारत सरकार, के समकक्ष 8 अप्रैल, 2018 को मोतीहारी मेंं आशय पत्र की अदला बदली (एल.ओ.आई.) केवेन्टर एग्रो और बिहार विद्यापीठ की बीच हुई ।
बिहार विद्यापीठ उद्भवन एवं उद्यमिता केंद्र के तरफ से श्री विशाल सिंह कार्य कर रहे है (एम.टेक आईआईटी मुम्बई, मैकेनिकल इंजीनियर, स्नातकोत्तर थीसिस की है । कृषि उद्यमी विशाल सिंह है ।

बागवानी अपशिष्ट आकलन और विश्लेषण में प्रबंध [एमटीडी 1] और सपोता फल कचरे के उपयोग द्वारा एथिल अल्कोहल उत्पादन [एमटीडी 2])। श्री विशाल सिंह एक केला उद्यमी के रूप में, बिहार में हो रही
केले की खेती और इसमें सर्वोत्तम प्रथाओं से संबंधित गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए के लिय कार्य कर रहे है ।

विशाल का केन फाइबर की व्यवहार्यता से संबंधित क्षेत्रों में अनुसंधान करने का इरादा है। इसके अलावा खेती के कचरे से उत्पादन, केले स्टार्च आदि से बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक तथा अन्य विषय भी अनुसंधान योग्य हैं।

इस गतिविधि के लिए बैंकिंग भागीदारों के रूप में नाबार्ड, बैंक ऑफ बड़ौदा और कैनरा बैंक सहयोग कर रही है ।

पुसा कृषि विश्वविद्यालय और सबौर कृषि विश्वविद्यालय तकनीकी सहायता और केला क्लस्टर के उत्थान के लिए मार्गदर्शन और किसान समर्थन मंच के अलावा अनुसंधान सहायता प्रदान करेगा !

( ब्रजेश कुमार के वाल से साभार )

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