जय माँ थावे भवानी

गोपालगंज शहर से मात्र 6 किलोमीटर की दुरी पर सिवान जानेवाले राष्ट्रिये राजमार्ग पर थावे नाम का जगह है वही माता थावेवाली का प्रसिद्द मंदिर है। माँ थावेवाली को सिंहासिनी भवानी, रहषु भवानी और थावे भवानी भी कहा जाता है। माँ थावेवाली असम के कामरूप से जहाँ माँ कामख्या का बड़ा प्राचीन और भव्य मंदिर है थावे आई थी इसलिए इनको कावरू कामख्या भी कहा जाता है।

प्राचीन काल में थावे में माता कामख्या के बहुत सच्चे  भक्त श्री रहषु भगत जी रहते थे। वो माता की बहुत सच्चे मन से भक्ति करते थे और माता भी उनकी भक्ति से प्रसन्न थी। माता की कृपा से उनके अन्दर बहुत सी दिव्य शक्तिया भी थी। लेकिन वहा के तत्कालीन राजा मनन सिंह को उनकी भक्ति पसंद नहीं थी। वो रहषु भगत जी को ढोंगी-पाखंडी समझते थे । एक दिन राजा ने अपने सैनिको को रहषु भगत जी को पकड़कर दरबार में लाने का आदेश दिया । दरबार में आने पर राजा ने रहषु भगत जी को ढोंगी-पाखंडी आदि अभद्र शब्दों का प्रयोग कर अपमानित किया और उनके माता के सच्चे भक्त होने का मजाक उडाया । रहषु भगत जी ने राजा को विनम्रता पूर्वक समझाया की माता की कृपा से ही मै सबकुछ करता हूँ और मेरी भक्ति से प्रसन्न होकर वो मुझे दर्शन भी देती है । राजा मनन सिंह के घर भी माता की पूजा होती थी लेकिन माता ने कभी दर्शन नही दिया था और चुकी रहषु भगत जी एक अछूत जाती के थे और माता उनको दर्शन देती है ये बात रहषु भगत जी से सुनते ही राजा अत्यंत क्रोधित हो उठे और भगत जी को चुनौती दिए की यदि तुम वास्तव में माता के सच्चे  भक्त हो तो मेरे सामने माता को बुलाकर दिखाओ नहीं तो तुम्हे दंड दिया जायेगा । भगत जी ने राजा को बार-बार और विनम्रता पूर्वक समझाया की महाराज अगर माता प्रकट हो गई तो अनर्थ हो जायेगा इसलिए आप अपना हठ छोड़ दीजिये और सच्चे मन से माता की भक्ति कीजिये । लेकिन राजा मनन सिंह अपने हठ पर अडे रहे । अब भगत जी के पास माता को बुलाने के अलावा कोई अन्य रास्ता नहीं बचा था । भगत जी ने माता का आह्वाहन किया । माता ने कामरूप से प्रस्थान किया और कोलकाता, पटना, आमी आदि स्थानों से होते जहाँ वो क्रमश: काली, पटनदेवी, अमिका भवानी आदि नामों  से प्रसिद्ध है, थावे पहुची । माता ने भगत जी के मस्तक को फाड़कर अपना कंगन दिखाया । उनके आगमन से पुरे राज्य में प्रलय जैसी स्थिति हो गई । राजा और उनके राज-पाट का अंत हो गया ।

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माता ने जहा दर्शन दिया वही उनके मंदिर का निर्माण किया गया । रहशु भगत जी मंदिर भी माता के मंदिर के पास ही है । यह कहा जाता है कि माँ थावेवाली के दर्शन के पश्चात रहशु भगत जी का दर्शन भी अवश्य करना चाहिए तभी माता प्रसन्न होती है ।

माँ थावेवाली बहुत दयालु और कृपालु है । अपने शरण में आये हुवे सभी भक्तो का कल्याण करती है । हर सुख-दुःख में लोग माँ के शरण में जाते है और करुणामयी  माँ किसी को भी निराश नहीं करती है, सबकी मनोकामना पूरी करती है । थावे के आस-पास किसी के घर शादी-व्याह जैसा शुभ कार्य हो या किसी को कोई दुःख बीमारी हो हर परिस्थिति में लोग माता की शरण में जाते है और माता उनका कार्य सिद्ध करती है मंगल करती है । माँ हर घडी और हर सुख-दुःख में अपने भक्तो पर करुणा और ममता की छाँव रखती है ।
देश-विदेह में रहने वाले लोग जब साल-दो साल पर अपने घर आते है तो सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण काम होता है माता थावेवाली का दर्शन करना । उनसे अपने और अपनों के लिए सुखद और समृद्ध जीवन की कामना करना । प्रतिदिन हजारो की संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन करने आते है और अपनी मनोकामनाये पूरी करते है । परन्तु अफ़सोस इस बात की है कि इतना बड़ी  आस्था और श्रध्दा का केंद्र होते हुवे भी इस स्थान का विकाश और व्यस्था जितना बढ़िया होना चाहिए उतना नहीं हुआ है । आज भी तीर्थयात्रियों के लिए दर्शन और विश्राम आदि की संतोषजनक व्यवस्था नहीं हो पायी है । और यह स्थान इतना प्राचीन होते हुए  भी एक क्षेत्र विशेष तक ही सिमित है । अतः आम जनता और प्रशासन को मिल-जुल कर माता के स्थान का समुचित विकाश और व्यवस्था  करना चाहिए ताकि थावे वाली माता का स्थान विश्व के मानचित्र पर एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल बन कर सामने आये ।

जब भी माँ थावेवाली के दर्शन को जाएँ तो वहां के सुप्रसिद्ध व्यंजन पुडुकिया का भोग जरुर लगायें!

        जय माँ थावे भवानी
        जय माँ कामख्या देवी
        जय हो रहसु भगत की

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