राजा के बकरी

ई कहानी हमनी के लइकाइं में सुनले रहनी जा पर भुला गइल रहे बाकिर जब भोजपुरी में लिखे के चस्का लागल ह त मन परल ह त सोचनी हा की जब कुछु दोसर लिखे लायक नइखे मिळत त कुछु खीसा कहानी भी लिखत रहीं जवना से भोजपुरी में लिखे के आदत हो जाव एही से आज ई कहानी लिखनी हा आ रउआ लोगिन लगे पहुंचवातानि. बकरी निमन लागि की बाउर नइखे पता.
कौनो राज के राजा के लगे एगो बकरी रहे जवना के बहुत मानत रहले. बाकिर उनका बुझाव की उनका बकरिया के पेट नइखे भरत, ई सोचला के बाद के बात ह कि राजा अपना राज में डुगडुगी पिटवा के कहले की जे केहु उनका बकरी के दिन भर चारा के अघवा दी ओकरा के आपन आधा राज दे देम, बाकरी शर्त ई बा की बकरी के पेट भरल बा की ना, ई जाँच उ अपने करिहें.
ई बात सुन के ईगो आदमी उनका लगे गइल आ बकरी के ले जा के दिन भर जंगल में चरवलस आ साँझी खान बकरी के ले के राजा के दरबार में आइल आ राजा से कहलस की उ दिन भर के बकरी के जंगल में चरवलस हा आ बकरी के पेट भर गइल बा. तब ओकरा बात के जाँच करे खातिर बकरी के आगे कुछ हरिहर घास डलले, तले का होता की हरिहर घास देखते बकरी ओकरा के खाए लागल। ई देख के राजा कहले की ना बकरी के पेट अभी नइखे भरल आ ओह आदमी के भगा देहले. ओकरा बाद केतना लोग आइल आ ओ बकरिया के ले जा के दिन दिन भर चरावे-खियावे बकरी जब बकरी राजा के लगे आवे उ हरिहर घास देखते खाए लागे। ढेर दिन इहे कुल्हि भइल केहु ले जा के बकरी के पेट न भर सकल.

एक दिन के बात ह ईगो बुढ ज्ञानी संत ओह राजा के राज में अइनी, ओह राज के लोग राजा से बड़ा परेसान हो गइल रहे लो, उ लोग ओह बाबा से निहोरा कइल तब उ ज्ञानी संत जी राजा किहां गइनी आ कहनी की काल्ह बकरी के उन्हे के जंगल में ले जाएम आ ओकर पेट भर के कहिया के ले आएम. अगिला दिन सबेरहिं राजा बकरी के संत के दिउवा दिहले आ उन्हा के बकरी के ले के जंगल में चल गइनी। जंगल में पहुंचला के बाद उँहा के बकरी के छोड़ देहनी आ ईगो डंटा ले के बकरिया के संगे संगे चले लगनी – जब बकरिया घास के लगी मुह ले जॉव की मुहवे पर एक डंटा मार दीं. सांझ होत बकरी के ई बुझाइल की जब उ घास खाई त मार पडी तब उ घास की ओर मुह ना करे. तब संत जी बकरी के ले के राजा के लगे गइनी आ झूठ मूठ के कहनी की बकरी के भर पेट कहिया देले बानी, राजा जी जाँच कर लीं. तब राजा बकरिया के लगे घास डाले के कहले बाकिर बकरिया मुह न लगवलस उ त बुझे की घास खाइम त मार पडि.
इहे हाल हमनी के मन के भी बा–अगर मन रूपी बकरी के विवेक रूपी लकड़ी से मारत रहल जाइ त कबो उ भोग के पीछे न भागी.

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