जिस उम्र में हम और आप युवा लोग खूबसूरत ज़िन्दगी के सपने देखते हैं। उसी उम्र में एक लड़के ने बगावत का झंडा उठा लिया। उसका सपना खुद के लिए  नहीं बल्कि देश के लिए कुछ करने का था .

3 दिसंबर 1889 को खुदीराम बोस का जन्म हुआ था . खुदीराम बोस जब बहुत छोटे थे तभी उनके माता-पिता का निधन हो गया था। लेकिन छोटी सी उम्र में ही खुदीराम बोस देश के मुक्ति आंदोलन में कूद पड़े थे। सत्येन बोस के नेतृत्व में खुदीराम बोस ने अपना क्रांतिकारी जीवन शुरू किया था। छोटा बालक बगावत का झंडा लिए आगे बढ़ रहा था, तभी एक रोज उसे गिरफ्तार कर लिया गया और 11 अगस्त 1908 को मुजफ्फरपुर जेल में फांसी पर लटका दिया गया। इस लड़के का नाम क्रांतिकारी खुदीराम बोस था।

खुदीराम बोस बचपन से ही उग्र विचार के थे, लेकिन उनको क्रांति की शिक्षा क्रांतिकारी बाबू सत्येन्द्रनाथ से मिली। राजनीतिक गतिविधियों में स्कूल के दिनों से ही भाग लेने लगे थे। उन दिनों अंग्रेज़ों से छोटे-छोटे हिन्दुस्तानी स्कूली बच्चे भी नफरत किया करते थे। वे जलसे जलूसों में शामिल होते थे तथा अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ नारे लगाते थे।जब खुदीराम बोस 14 साल के थे, तो उनकी मुलाकात सत्येन्द्रनाथ से हुई और उसके बाद खुदीराम बोस अपने लिए नहीं देश के लिए सांसे लेने लगे।खुदीराम बोस ने अंग्रेजों की अत्याचारी सत्ता से देश को मुक्त कराने के जज्बे के साथ अपनी पढ़ाई नौवीं में ही छोड़ दी और देश आजाद कराने का ख्वाब देने लगे।

फरवरी 1906 में क्रांतिकारी और खुदीराम के गुरु सत्येंद्रनाथ द्वारा लिखे ‘सोनार बांगला’ नामक ज्वलंत पत्रक की प्रतियां बांटने के कारण एक पुलिस वाला खुदीराम को पकड़ने के लिये दौड़ा। खुदीराम सिपाही के मुंह पर घूंसा मार भाग गये। इसके कारण खुदीराम पर राजद्रोह का मामला चला लेकिन गवाह की कमी के कारण उन्हें छोड़ दिया गया।

इसके बाद एक क्रूर ब्रिटिश अफसर किंग्जफोर्ड को मारने का जिम्मा खुदीराम बोस और उनके एक दोस्त को दिया गया . खुदीराम और प्रफुल्लकुमार चाकी किंग्जफोर्ड को मारने के लिए मुजफ्फरपुर पहुंच गये। 30 अप्रैल को 1907 को दोनों किंग्जफोर्ड को मारने के लिए किंग्जफोर्ड के बंगले के बाहर उसके आने का इंतजार कर रहे थे।रात में क्लब से किंग्जफोर्ड की बग्घी के समान दिखने वाली गाड़ी आते हुए देखकर खुदीराम बोस ने बम फेंक दिया। खुदीराम ने किंग्जफोर्ड की गाड़ी समझकर बम फेंका था, लेकिन उस दिन किंग्जफोर्ड थोडी देर से क्लब से बाहर आने के कारण बच गया। बम फेंकने के बाद दोनों वहां से भाग निकले, लेकिन अंग्रेज पुलिस उनके पीछे लग गयी और वैनी रेलवे स्टेशन पर दोनों को पुलिस पकड़ ली। अपने को पुलिस से घिरा देख प्रफुल्लकुमार चाकी ने खुद को गोली मारकर अपनी शहादत दे दी जबकि खुदीराम पकड़े गये और उनको 11 अगस्त 1908 को मुजफ्फरपुर जेल में फांसी पर लटका दिया गया। कई इतिहासकारों के अनुसार खुदीराम बोस सबसे कम उम्र फांसी पर चढ़ने वाले क्रांतिकारी थे।

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