जिस ऐतिहासिक धरोहर को हम बिहार के लोग भूल गए है विदेश में एयरपोर्ट पे लोग उसके नज़ारे देख रहे है .

जब आप बैंकॉक एअरपोर्ट से बाहर निकलेंगे आपके सामने भव्य मंदार पर्वत दिखेगा ..समुद्रमंथन की बड़ी ही भव्य व रंगीन झांकी दिखेगी जिससे मन मुग्ध हो जाएगा . मंदार पर्वत की चोटी पर बैठे भगवान विष्णु की मूर्ति। मंदार से लिपटे बासुकीनाग। सर्पराज बासुकी के मुख की तरफ असुर और पूंछ की तरफ सुर। सुर और असुर के सहयोग से समुद्रमंथन , क्षीरसागर .. देखने के बाद मन खुश हो जाएगा .

ख़ुशी होने के साथ दुःख भी होता है संस्कृति हमारी और उसे प्रचारित दूसरे देशवासी कर रहे हैं। हमारे भागलपुर रेलवे स्टेशन के बोर्ड पर सिर्फ लिखा रहता है – मंदार हिल जाने के लिए यहां लाइन बदलिए। एक तस्वीर भी ऐसी नहीं दिखती है। एक यह देश है, जहां से हमारी संस्कृति के संदेश फैल रहे हैं। हमने अपनी संस्कृति और अपनी विरासत को प्रोजेक्ट करना सीखा ही नहीं है।’

वैसे तो जिला स्तर पे मंदार महोत्सव का आयोजन जिला प्रशासन के द्वारा किया जाता रहा है लेकिन अबतक इस महोत्सव को राज्य स्तरीय मेले तक का दर्जा नहीं मिल पाया है। मंदार की धरती आज भी पर्यटन के मानचित्र पर अपनी पहचान कायम नहीं कर सकी है।

सीता कुंड, शंख कुंड, आकाश गंगा के अलावे नरसिंह भगवान गुफा, शुकदेव मुनी गुफा, राम झरोखा के अलावे पर्वत तराई में लखदीपा मंदिर, कामधेनु मंदिर एवं चैतन्य चरण मंदिर मौजुद हैं। वहीं मंदार पर्वत पर काफी संख्या में देवी देवताओं की प्रतिमाएं रखी हुई। पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार यहां काफी प्राचीण प्रतिमाएं हैं। पिछले कइ सालों से यह यहां इसी प्रकार पड़ी हुई हैं। काले ग्रेनाईट पत्थर का विशाल पर्वत अपने आप में कई सदियों का इतिहास समेटे हुए है। जानकारों के अनुसार औरव मुनी के पुत्री समीका का विवाह धौम्य मुनी के पुत्र मंदार से हुआ था। जिसकी वजह से इस पर्वत का नाम मंदार पड़ा था

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