मुजफ्फरपुर बाल गृह कांड से ही एक जुड़ा मामला कुछ सालों पहले का है. रूपा का मामला. तब मुजफ्फरपुर में यह बहुत चर्चित् हुआ था. रूपा बांग्लादेश की लड़की थी. वह मुजफ्फरपुर में मिली थी. उसे तब के डीएसपी ने बाल सुधार गृह में ही भेज दिया था. कुछ लोगों ने विरोध किया कि कहां नरक में भेज दिया गया रूपा को. रूपा भी एक ही रात वहां रही तो बतायी कि वहां की एक प्रमुख संचालिका, जो एनजीओ की सदस्य भी हैं, उसी रात रूपा को गर्म कर कलछूल से पिटी थी. किस कारण से, तब यह बात भी सामने आयी थी. अगले दिन डीएसपी सक्रिय हुए. रूपा को वहां से निकाला गया. कोलकाता दूतावास के प्रयास से वह वापस बांग्लादेश भेजी गयी. इसलिए यह विस्फोट अचानक नहीं है. टाटा इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट तो एक बात है, नाबालिक बच्चियों से बलात्कार एक बात है लेकिन मुजफ्फरपुर में हर सक्रिय और सरोकारी लोग जानता था कि ब्रजेश का वह संस्थान मूलत: सुधारगृह के रूप में नहीं बल्कि यातनागृह के रूप में चलता था. लेकिन आरंभ से ही यातना की कहानियों पर जब मुजफ्फरपुर का सिविल सोसायटी चूप रहा, पत्रकारिता इस मसले को उठानेसे बचती रही तो यातनागृह बाद में बलात्कार गृह में बदल गया. समाज की चुप्पी से या अकर्मण्यता से भी ब्रजेश जैसे लोगों का मनोबल बढ़ता है, क्रूरता और यातनाएं बढ़ती हैं. राजनीतिक तौर पर बात हो, बेशक हो, जरूर हो लेकिन ऐसे कई मसले पर सिविल सोसाइटी पर भी सवाल होते रहे. समाज की सड़ांधता को सिर्फ राजनीति दूर करनेवाला नहीं है.

 

( वरिष्ठ पत्रकार निराला बिदेसिया के वाल से साभार )

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