जैसे ही सर्दी का मौसम शुरू होता है बाज़ार में तिल से बनी मिठाइओं का क्रेज़ बढ़ जाता है। तिलकुट शरीर को गर्म रखने में काफी मददगार होता है इसके कारण लोग ठंड में इसका ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं। इसी कारण तिल से बनी सभी मिठाइयां जैसे तिलकुट, मस्का, तिल पापड़ी आदि की बिक्री इस मौसम में अधिक बढ़ जाती है। ऐसे में जो गया का तिलकुट जो गया में पूरे साल बिकता है वो ठण्ड के मौसम में बिहार और झारखण्ड के अलग अलग अलग शहरों में मिलने लगता है . जिससे पिछले कुछ सालो में गया का तिलकुट बिहार और झारखंड में ही नहीं, बल्कि देश – विदेश तक में प्रसिद्ध हो गया है.इसके पीछे एक कारण ये भी है की बोधगया में विदेश से आने वाले पर्यटक की अच्छी खासी तादात होती है .

गया में तिलकुट बनाने का कारोबार सैकड़ो साल पुराना है। गया के तिलकुट की खास बात है कि यह काफी खस्ता होता है। इसमें चीनी की मात्रा काफी कम होती है। एक अनुमान के मुताबिक, इस व्यवसाय से गया जिले में करीब सात हजार से ज्यादा लोग जुड़े हैं. तिलकुट खाने से कब्ज जैसी समस्या नहीं होती है और यह पाचन क्रिया को भी बढ़ाता है। वैसे तो पूरे देश में कई जगहों पर तिलकुट का व्यवसाय होता है, लेकिन गया में निर्मित तिलकुट और उसके स्वाद का मुकाबला कहीं नहीं है।

गया में निर्मित तिलकुट और उसके स्वाद का मुकाबला कहीं नहीं है। यहां के तिलकुट के स्वाद का जोड़ कहीं नहीं है। यही वजह है कि गया में निर्मित तिलकुट झारखंड, उतरप्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, महाराष्ट्र सहित पाकिस्तान, बांगलादेश, नेपाल जैसे देशों में भी भेजी जाती हैं। गया आने-जाने वाले लोग यहां के तिलकुट का स्वाद जरूर लेते है और अपने दूर-दराज के रिश्तेदारों के लिए भी तिलकुट ले जाते हैं।

मकर संक्रान्ति 14 जनवरी को मनायी जाती है। इस दिन तिल का मिठाई ख़ासकर तिलकुट का विशेष महत्व होता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन तिल का दान करने व तिल के सेवन से मोक्ष की प्राप्ति होती है। अगर बात करें बिहार की तो यहां अधिकांश घरों में मकर संक्रान्ति के दिन तिलकुट का सेवन ज़रूर होता है और इसे मकर संक्रान्ति की मिठाई के नाम से भी जाना जाता है।

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